Mahashivratri special 2020

Mahashivratri

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  • ब्रह्मा विष्णु महेश के माता पिता कोन है?
  • हम इतने देवी देवताओं की भगति करते है फिर भी दुखी क्यों है?


 श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी के पास आए। उस समय श्री विष्णु जी लक्ष्मी सहित शेष शैय्या पर सोए हुए थे। साथ में अनुचर भी बैठे थे। श्री ब्रह्मा जी ने श्री विष्णु जी से कहा बेटा, उठ देख तेरा बाप आया हूँ। मैं तेरा प्रभु हूँ। इस पर विष्णु जी ने कहा आओ, बैठो मैं तुम्हारा पिता हूँ। तेरा मुख टेढ़ा क्यों हो गया। ब्रह्मा जी ने कहा - हे पुत्र! अब तुझे अभिमान हो गया है, मैं तेरा संरक्षक ही नहीं हूँ। परंतु समस्त जगत् का पिता हूँ। श्री विष्णु जी ने कहा रे चोर ! तू अपना बड़प्पन क्या दिखाता है ? सर्व जगत् तो मुझमें निवास करता है। तू मेरी नाभि कमल से उत्पन्न हुआ और मुझ से ही ऐसी बातें कर रहा है। इतना कह कर दोनों प्रभु आपस में हथियारों से लड़ने लगे। एक-दूसरे के वक्षस्थल पर आघात किए। यह देखकर सदाशिव (काल) ने एक तेजोमय लिंग उन दोनों के मध्य खड़ा कर दिया, तब उनका युद्ध समाप्त हुआ। 
श्री शिव महापुराण के विद्येश्वर संहिता के अध्याय 9 व 10 पृष्ठ 14 से 18 पर लिखा है कि युद्ध कर रहे ब्रह्मा तथा विष्णु के मध्य में जो प्रकाशमय स्तम्भ प्रकट हुआ था। उस के अन्त को न पा कर दोनों थक चुके तब उस स्तम्भ से वह ईश्वर साकार हुआ। उसको देखते ही विष्णु ने कांपते हुए हाथों से उनके चरण पकड़ लिए। कहा मुझे स्तम्भ का अन्त नहीं पाया। ईश्वर बोले वत्स विष्णु आपने सत्य कहा है। इस प्रकार सत्य कहने से शिव विष्णु पर बहुत खुश हुए। अपनी समानता विष्णु को दी। ब्रह्मा ने झूठ बोला कि मैंने स्तम्भ का अन्त पा लिया है। इसलिए शिव ने (जो स्तम्भ से प्रकट हुआ था) भैरो की उत्पति की उस से कह कर ब्रह्मा का पांचवा मुख कटा दिया। जिससे ब्रह्मा ने झूठ बोला था। तब उस शिव ने ब्रह्मा तथा विष्णु को कहा कि तुमने अज्ञान से अपने को ईश (प्रभु) माना तुम प्रभु नहीं हो। इसी को दूर करने को ही मैं रण स्थान में आया हूँ। मैं इस सब का ईश्वर हूँ यह संसार मेरा है। शिव बोला हे पुत्रों (ब्रह्मा-विष्णु) आपने यह कृत्य (सृष्टी-स्थिति) अपने तप से प्राप्त किया है। मैंने प्रसन्न होकर तुम्हें दिया है।
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 उपरोक्त युद्ध का विवरण पवित्र शिव पुराण से है, जिसमें दोनों प्रभु पाँच वर्ष के बच्चों की तरह झगड़ रहे हैं। वे कहा करते हैं कि तू मेरा बेटा, दूसरा कहा करता है तू मेरा बेटा, मैं तेरा बाप। फिर एक - दूसरे का गिरेबान पकड़ कर मुक्कों व लातों से झगड़ा करते हैं। यही चरित्र त्रिलोक नाथों का है।

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